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बिल्डर –बैंक, गठजोड़ या गिरोह

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नई दिल्ली (गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र) :  पंकज ने नोएडा में एक नामी बिल्डर के प्रोजेक्ट में करीब 10 साल पहले 3 बेडरूम फ्लैट के लिए आवेदन किया था। इंतजार अभी चल रहा है। 20 सालों के लिए बैंक से लोन लिया था, आधी से ज्यादा किश्ते बैंक वसूल चुका है लेकिन  फ्लैट अभी आधा-अधूरा बन कर खड़ा है। काम भी रुका हुआ है। अब सरकार ने कहा है कि ऐसी अधूरी परियोजनाओं को वह पूरा कराएगी।

ये एक पंकज की कहानी नहीं है। दिल्ली- एनसीआर में ऐसे हजारों लोग हैं जो फलैट बुक कराने के बाद सालों-साल घर की चाबी के लिए इंतजार कर रहे हैं और साथ ही मकान का किराया भी भर रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार, पूरे देश में बिल्डरों से फ्लैट खऱीदने वाले लगभग शत-प्रतिशत लोग बैंको से लोन लेते हैं। कुछ ऐसे भी खरीदार होते हैं जो कागजों पर लोन दिखाते हैं लेकिन बिल्डर के साथ मिलीभगत में कैश या काले धन को बिल्डर फ्लैटों में खपा लेते हैं। अब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने बैंक-बिल्डर गठजोड़ं की सीबीआई जांच की बात कही है।

 बिल्डर –बैंक और बायर

किसी भी बिल्डर प्रोजेक्ट में के तीन किरदार होते हैं। बिल्डर जो फ्लैट को निश्चित समय़ सीमा में बना कर बायर को देता है या देने का वादा करता है। बायर जो फ्लैट का खरीदार होता है। वह बिल्डर को फ्लैट की बुंकिंग के साथ ही पैसा देना शुरू कर देता और उसे एक समय सीमा में पूरा पैसा चुकाना होता है। अब यहीं पर एक तीसरा पक्ष भी है। वह है बैंक। बायर को आमतौर पर फ्लैट खरीदने के लिए बैंकों से कर्ज लेना पड़ता है। कर्ज को चुकाने की अवधि होती है 10 साल, 20 साल या फिर अब तो 30 साल के लिए भी बैंक से लोन मिल रहा है।

आमतौर पर कोई भी बायर फ्लैट खरीदने के पहले उस बिल्डर प्रोजेक्ट के अप्रूवल के सारे कागजात वगैरह देखता है। बिल्डर आपको साथ ही यह भी बताता है कि उसके प्रोजेक्ट पर फलां-फलां बैंक लोन उपलब्ध करा रहे हैं। बायर का हौसला बैंक से अप्रूवल की बात सुन कर थोड़ा और बढ़ जाता है कि चलो बैंक भी लोन दे रहा है तो कागज सब दुरुस्त होंगे। लेकिन दरअसल यही एक दुष्चक्र है।

कैसे काम करता है बिल्डर-बैंक का दुष्चक्र

दिल्ली-एनसीआर में बिल्डर और बैंक आपस में मिलकर एक गिरोह की तरह से काम करते हैं। नियमानुसार, किसी भी प्रोजेक्ट के लिए बैंक को फाइनेंस करने से पहले उस प्रोजेक्ट से संबंधित सारे अप्रूवल, कानूनी पक्ष, बिल्डर की क्रेडिबिलिटी सभी कुछ देखना होता है। यानी प्रोजेक्ट एकदम साफ-सुथरा होने की स्थिति में ही बैंक फाइनेंस करते हैं।

कहानी में ट्विट्स यहीं है। बिल्डर और बैंक मिलकर यहीं खेल करते हैं। बिल्डर को पैसा बैंक के जरिए  बायर से  चाहिए और बैंक तो बायर से पैसा निकाल ही लेगा। बायर जब लोन पर फ्लैट खऱीद लेता है तब उस अमूर्त मकान के कागजात बैंक के पास गिरवी रख लिए जाते हैं और बायर अपने फ्लैट की उम्मीद में किश्ते चुकाना शुरू कर देता है।

कहानी यहां तक तो ठीक है। मान लीजिए, कुछ समय के बाद उस प्रोजेक्ट पर कोई कानूनी लफड़ा हो जाता है या बिल्डर नुकसान होने की बात करके हाथ खड़ा कर देता है और प्रोजेक्ट पर काम रुक जाता है। अब ऐसे में क्या होता है ?  बायर तो बैंक की कश्ते भर रहा है, प्रोजेक्ट पर काम हो नहीं रहा है और दूसरी तरफ बायर जिस मकान में रह रहा है उसे उसका किराया भी भरना पड़ रहा है। यानी बिल्डर खुश उसे बायर के हवाले से बैंक से पैसा मिल गया। बैंक खुश क्योंकि, वह तो बायर से वसूल ही रहा है वह भी ब्याज के साथ। बायर दोनों तरफ से पिस रहा है- उसे अपना घर कहीं दिख नहीं रहा, जल्दी मामला सुलट जाएगा यह  उम्मीद भी नहीं और किश्त और भऱो और साथ ही मकान का किराया भरो। सोचिए कितनी दयनीय स्थिति बन जाती है।

उपभोक्ता मामलों को देखने वाले अधिवक्ता विरल जैन के अनुसार, ‘ऐसे भी मामले देखने को मिले हैं जब बिल्डर अपने प्रोजेक्ट को खुद ही कानूनी लफड़ों में में फंसवा देता है और अदालती रोक की आड़ में खेल करता है।’ वे बताते हैं कि, ‘नोएडा एक्सटेंशन से बढ़िया कोई उदाहरण नहीं है। यहां बिल्डरों को मायावती की सरकार में बहुत ही कम कीमत पर जमीन दी गई वह भी 10 साल की किश्तों में। बिल्डरों को उस जमीन पर प्रोजेक्ट लॉंच करने की इजाजत भी दे दी गई। अब सोचिए जिस जमीनपर बिल्डर प्रोजेक्ट बेच रहा है बैंक पैसा दे रहा है उस जमीन का पूरा पैसा बिल्डर ने खुद नहीं भरा है। कुछ बिल्डरों ने ठीकठाक प्रोजेक्ट भी कर दिए। लेकिन अधिकतर ऐसे निकले जिन्होंने बायर्स के हवाले से बैंको से पैसा लिया, कुछ पैसा प्रोजेक्ट में लगाया और बाकी की और जमीने खरीद लीं। या कहीं और निवेश कर दिया। कुछेक ने तो चुनाव भी लड़ लिया।’ वे बताते हैं कि, ‘इस कहानी में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का एंगल भी बहुत गहरे घुसा है।’

उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 का मसौदा बनाते वक्त उठा था मामला

जब नया उपभोक्ता संरक्षण बिल तैयार किया जा रहा था रामविलास पासवान, उपभोक्ता मामलों के मंत्री थे। उनके पास विभिन्न निजी संगठनों की तरफ से सिफारिश भेजी गई थी कि नए बिल के मसौदे में बैंकों और बिल्डरों के गठजोड़ से बायर को हो रही तकलीफ के बारे में सोचा जाए। लेकिन उस मोर्चे पर बात सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित रह गई और कुछ ठोस नहीं हो पाया। कई सिफारिशों में जोरशोर से मांग की गई थी कि, अगर कोई बिल्डर प्रोजेक्ट कानूनी लफड़े में फंस कर रुकता है तो साथ ही साथ बैंकों को बायर की तरफ से जाने वाली ईएमआई को रोक देना चाहिए और वह काम चालू होने की स्थिति में ही देय होना चाहिए।

सुझावों, में कहा गया था कि आखिर बैंक ने भी बायर को फाइनेंस करके बिल्डर के अप्रूवल पर मुहर लगाई थी तब वह अपनी जिम्मेदारी से बच कैसे सकता है।

उस समय, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद के सदस्य, बिनोद आशीष के अनुसार, ‘बिल्डर-बैंक की गिरोहबंदी के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून में सख्त प्रावधानों की वकालत करते हुए कई दलीले दी गईं और प्रारंभिक तौर पर उन्हें मसौदे में शामिल भी किया गया लेकिन बाद में क्या हुआ पता ही नहीं चला। सारी लड़ाई  को सेलिब्रिटीज़ के विज्ञापनों पर सीमित कर दिया गया।’ वे बताते हैं कि, ‘इस गठजोड़ को सिर्फ बैंक और बिल्डर तक ही मत देखिए, इसमें कई पेंच हैं। अफसर, नेता, पूंजीपति सभी का कालाधन बैंक की आड़ में सपेद होता है।’ हालांकि बिनोद यह मानते हैं कि, ‘रेरा जैसे नियम आने के बाद काफी फर्क पड़ा है। खुद ही देखिए आज नोएडा एक्सटेंशन के कितने प्रोजेक्ट फंसे पड़े हैं। अगर इनसे जुड़े बैंकों को ईएमआई बंद हो जाने का खतरा होता तो वे ऐसे फ्रॉड प्रोजेक्टों में कभी पैसा फाइनेंस न करते।’

क्या सुप्रीम कोर्ट के दखल से सुधरेगी तस्वीर ?

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली – एनसीआर क्षेत्र में बिल्डरों और बैंकों की सांठ-गांठ पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने पूछा है कि आखिर किसी बिल्डिंग की एक ईंट पड़े बिना बैंक कैसे 60 से 80 प्रतिशत तक लोन ट्रांसफर कर दे रहे हैं? कोर्ट ने कहा है कि बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए खरीदारों को बिना वजह समस्या में डाला जा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह इस गठजोड़ की जांच सीबीआई से करवाएगा और जो भी अधिकारी दोषी पाए जाएंगे,  उन्हें पाताल से ढूंढ कर दंड दिया जाएगा।

दरअसल, ग्रेटर नोएडा के कुछ बिल्डिंग प्रोजेक्ट के खरीदार सुप्रीम कोर्ट यह कहते हुए पहुंचे थे कि बिल्डर की तरफ से की गई देरी के चलते उन्हें अब तक फ्लैट का कब्जा नहीं मिला है, लेकिन बैंक उन्हें ईएमआई चुकाने के लिए मजबूर कर रहा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्य कांत और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने पाया कि आधे-अधूरे बिल्डिंग प्रोजेक्ट के लिए भी बैंक सबवेंशन स्कीम के तहत बिल्डर के खाते में 60 से 80 प्रतिशत तक लोन राशि का भुगतान कर दे रहे हैं।

जजों ने क्या कहा?

जजों ने कहा कि पैसे सीधे बिल्डर के खाते में डाले जाते हैं। ऐसा करने से पहले बैंक यह तक नहीं देखता कि प्रोजेक्ट की एक ईंट भी पड़ी है या नहीं? यह बैंक अधिकारियों की तरफ से बिल्डर को फायदा पहुंचाना और उसके बदले खुद भी लाभ कमाने का मामला नहीं तो क्या है ? इस तरह बैंक और बिल्डर आपस में मिलीभगत कर निर्दोष खरीदारों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? खरीदारों से उन पैसों का हिसाब मांगा जा रहा है, जो उन्होंने कभी देखे ही नहीं। जो पैसे बैंक ने सीधे बिल्डर के खाते में डाल दिए थे।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो  से जांच / जांच कैसे की जाए, इस पर प्रस्ताव मांगा है। न्यायालय ने मुद्दों पर आगे बढ़ने में सहायता के लिए एक एमिकस क्यूरी भी नियुक्त किया है।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

 

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